चौहान वंश का इतिहास : अजमेर के चौहान (संपूर्ण नोट्स)

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चौहान वंश का इतिहास : अजमेर के चौहान (संपूर्ण नोट्स)

आज की इस पोस्ट में हम चौहान वंश का इतिहास में अजमेर के चौहान के बारे में संपूर्ण नोट्स उपलब्ध करवा रहे हैं। अगर आपके सिलेबस में राजस्थान का इतिहास विषय है तो आपको यह नोट्स एक बार जरूर पढ़ने चाहिए, क्योंकि हम आपके लिए ऐसे नोट्स उपलब्ध करवाते हैं जिन्हें पढ़कर आप बिना किसी कोचिंग के घर पर शानदार तैयारी कर सकते हैं।

अजमेर के चौहानों का इतिहास विस्तृत रूप से आप नीचे पढ़ सकते हैं। इस टॉपिक को आपको अन्य कहीं से पढ़ने की आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि इन्हें पढ़ने के बाद आपका कोई भी डाउट शेष नहीं रहेगा।

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चौहानों की उत्पत्ति के मत एवं प्रारम्भिक शासन

  • अग्निकुण्ड सिद्धान्त – ‘पृथ्वीराज रासो’ (चन्दबरदाई), ‘मुहणोत नैणसी’ एवं ‘सूर्यमल्ल मीसण’ के अनुसार अग्निकुण्ड से उत्पन्न चार राजपूत वंशों (प्रतिहार, परमार, चालुक्य, चौहान) में एक।
  • वत्सगोत्रीय ब्राह्मण / ब्राह्मणवंशीय – बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) के आधार पर डॉ. दशरथ शर्मा (चुरू) ने यह मत दिया।
  • विदेशी जाति से उत्पन्न – कर्नल जेम्स टॉड, डॉ. स्मिथ एवं विलियम क्रुक ने इन्हें विदेशी (शक या हूण) माना।
  • सूर्यवंशी क्षत्रिय – ‘पृथ्वीराज विजय’, ‘हम्मीर महाकाव्य’, ‘सुर्जनचरित’ तथा डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने चौहानों को सूर्यवंशी क्षत्रिय बताया।
  • अचलेश्वर मंदिर के लेख में इन्हें चंद्रवंशी माना गया है, तो सेवाडी के लेख में इन्द्र के वंशज
  • सुंधा माता अभिलेख के अनुसार उत्पत्ति महर्षि वशिष्ठ की आँख से हुई।

प्रारम्भिक राजधानी एवं स्थान: हर्षनाथ अभिलेख के अनुसार प्राचीनतम राजधानी अनंतपुर (सीकर) थी। हम्मीर महाकाव्य व सुर्जनचरित में जन्मभूमि पुष्कर बताई गई है। प्रारम्भ में चौहान गुर्जर-प्रतिहारों के सामंत थे। गूवक प्रथम ने चौहानों को प्रतिहारों की अधीनता से मुक्त करवाया।

– चौहानों के निवास स्थान: जांगल देश (बीकानेर, जयपुर, उत्तरी मारवाड़), सपादलक्ष (सांभर), अहिच्छत्रपुर (नागौर)।
– सांभर के चौहानों की प्रमुख शाखाएँ: लाट, धवलपुरी, प्रतापगढ़, शाकम्भरी, रणथम्भौर, नाडोल, जाबालिपुर, सप्तपुर।

वासुदेव चौहान : वंश का आदिपुरुष

– शाकम्भरी के चौहान वंश का आदिपुरुष वासुदेव (बिजौलिया शिलालेख, सुर्जन चरित्र, डॉ. दशरथ शर्मा द्वारा रचित ‘अर्ली चौहान डायनेस्टी’ के अनुसार)।

राज्य स्थापना: 551 ई. में वासुदेव चौहान ने सांभर (शाकम्भरी) में वंश की नींव रखी।
राजधानी: अहिच्छत्रपुर (नागौर)।
सांभर झील का निर्माण करवाया (बिजौलिया शिलालेख के अनुसार)।

चौहान वंश का इतिहास : वासुदेव चौहान (शाकम्भरी के चौहानों के संस्थापक)

अजमेर के चौहान : प्रमुख शासक एवं उपलब्धियाँ

अजयराज (शासनकाल: 1105-1133 ई.)

– पृथ्वीराज-प्रथम का पुत्र। 1113 ई. में अजयमेरु (अजमेर) नगर की स्थापना की तथा उसे राजधानी बनाया। (कुछ इतिहासकारों के अनुसार 7वीं शताब्दी में अजयपाल ने अजयमेरू दुर्ग बनवाया था)।
– अजमेर में टकसाल स्थापित कर ‘अजय-प्रिय द्रम्म’ नाम से चाँदी व ताँबे के सिक्के चलाए। इन सिक्कों पर रानी सोमलेखा (सोमल्लदेवी) का नाम अंकित है।
शैव मतावलम्बी होते हुए भी जैन व वैष्णवों को सम्मान दिया। पार्श्वनाथ मंदिर के लिए स्वर्ण कलश प्रदान किया।
– युद्ध: मालवा के परमार शासक नरवर्मन, अन्हिलपाटन के चालुक्य शासक मूलराज द्वितीय तथा पृथ्वीराज विजय के अनुसार तुर्क सुल्तान शहाबुद्दीन को परास्त किया।
– अंतिम दिन पुष्कर तीर्थ में तपस्या करते हुए व्यतीत किए।

अर्णोराज (आनाजी) (शासनकाल: 1133-1155 ई.)

– उपाधियाँ: महाराजाधिराज, परमभट्टारक, परमेश्वर।
1137 ई. में अजमेर में आनासागर झील का निर्माण करवाया (बिजौलिया शिलालेख 1133-37 ई., पृथ्वीराज रासो 1135-37 ई.)।
– पुष्कर में वराह मंदिर (विष्णु) का निर्माण करवाया (बाद में समरसिंह ने जीर्णोद्धार, जहाँगीर ने मूर्ति नष्ट करवाई)।
– दरबारी विद्वान: देवबोध और धर्मघोष।
– चालुक्य शासक सिद्धराज जयसिंह को पराजित कर उनकी पुत्री कांचन देवी से विवाह। पुत्री जल्हण का विवाह कुमारपाल चालुक्य से किया।
हत्या: 1155 ई. में बड़े पुत्र जगदेव ने पितृहत्या कर दी।

विग्रहराज-चतुर्थ (बीसलदेव) (शासनकाल: 1158-1163 ई.)

‘चौहानों का स्वर्णयुग’
– दिल्ली पर अधिकार करने वाला प्रथम चौहान शासक (तोमरों को पराजित कर)। गजनी के खुसरुशाह को भी पराजित किया।
– संस्कृत में ‘हरकेलि’ नाटक की रचना। दरबारी कवि सोमदेव ने ‘ललित विग्रहराज’ लिखा। जयानक भट्ट ने इन्हें ‘कवि बान्धव’ की उपाधि दी।
सरस्वती कंठाभरण नामक संस्कृत पाठशाला का निर्माण (बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक ने तोड़कर ‘ढाई दिन का झोंपड़ा’ मस्जिद बनवाई)।
– बीसलपुर नगर (टोंक) की स्थापना तथा बीसलपुर / बीसलसर झील का निर्माण।
– एकादशी के दिन पशु वध पर प्रतिबंध लगाया।
– किलहॉर्न के अनुसार “वह उन हिन्दू शासकों में से एक था जो कालिदास और भवभूति की होड़ कर सकता था।”

पृथ्वीराज चौहान-तृतीय (शासनकाल: 1177-1192 ई.)

जन्म: 1166 ई. (विक्रम संवत 1223, ज्येष्ठ मास द्वादशी) गुजरात के अन्हिलपाटन में। पिता: सोमेश्वर, माता: कर्पूरी देवी (कलचूरि वंश की राजकुमारी)।
राज्याभिषेक: 11 वर्ष की आयु में 1177 ई.। बाल्यकाल में शासन की देखभाल प्रधानमंत्री कदम्बवास (कैमास) एवं सेनाध्यक्ष भुवनैकमल्ल (माता के चाचा) ने की।
उपाधियाँ: रायपिथौरा, दलपुंगल (विश्व विजेता), भारतेश्वर, हिंदु सम्राट, सपादलक्षेश्वर।
प्रमुख युद्ध: 1178 ई. में चचेरे भाई नागार्जुन का विद्रोह दमन; 1182 ई. में सतलज प्रदेश के भण्डानकों को हराया; तुमुल का युद्ध (1182 ई.) – महोबा के चंदेल शासक परमर्दिदेव (आल्हा-ऊदल) को पराजित किया; कन्नौज के जयचंद गहड़वाल को पराजित कर संयोगिता स्वयंवर प्रसंग (गंधर्व विवाह)।
– दिल्ली में रायपिथौरागढ़ (लालकोट) का निर्माण करवाया।
– दरबारी विद्वान: चन्दबरदाई (पृथ्वीराज रासो), जयानक (पृथ्वीराज विजय), वागीश्वर, विद्यापति गौड़, जनार्दन, विश्वरूप आदि।
तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.): मुहम्मद गौरी को पराजित किया। तबरहिंद (बठिंडा) दुर्ग पर अधिकार।
तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.): जयचंद की सहायता, सेनापति गोविन्दराय तोमर व समरसिंह वीरगति; पृथ्वीराज की पराजय, चौहान साम्राज्य का पतन।
पृथ्वीराज रासो का प्रसिद्ध दोहा:

“चार बाँस, चौबीस गज, अँगुल अष्ट प्रमाण,
ता ऊपर सुल्तान है, मत चुके चौहान”

– डॉ. दशरथ शर्मा ने पृथ्वीराज को “सुयोग्य शासक” कहा है।

तराइन के युद्ध : निर्णायक संघर्ष

प्रथम युद्ध (1191 ई.) – पृथ्वीराज ने मुहम्मद गौरी को पराजित किया। गौरी घायल हुआ। सेनापति खाण्डेराव थे। तबरहिन्द (सरहिन्द) का दुर्ग छीनकर काजी जियाउद्दीन को बंदी बनाया।
द्वितीय युद्ध (1192 ई.) – 120,000 सैनिकों के साथ गौरी ने पुनः आक्रमण। पृथ्वीराज के मंत्री सोमेश्वर प्रतापसिंह के विश्वासघात से पराजय। यह युद्ध भारत के इतिहास में युग परिवर्तनकारी था: राजपूत काल का अंत और दिल्ली सल्तनत की स्थापना।
– हसन निजामी (ताज-उल-मासिर), मिनहाज-उस-सिराज (तबकात-ए-नासिरी) प्रमुख स्रोत हैं।
– पृथ्वीराज को बंदी बनाकर गजनी ले जाया गया, नेत्रहीन किया गया और अंततः मृत्यु हुई। पृथ्वीराज का स्मारक अजमेर के तारागढ़ दुर्ग में है।

चौहान वंश की अन्य प्रमुख शाखाएँ

रणथम्भौर के चौहान

संस्थापक: गोविन्दराज (1194 ई.), पृथ्वीराज तृतीय का पुत्र। हम्मीरदेव (1282-1301 ई.) सबसे प्रतापी शासक। अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण (1299-1301 ई.) में शरणागत मोहम्मद शाह व केहब्रू की रक्षा करते हुए 1301 ई. में वीरगति। रणथम्भौर दुर्ग में 11 जुलाई 1301 ई. को जौहर (राजस्थान का प्रथम शाका)। अमीर खुसरो ने युद्ध का वर्णन ‘खजाइन-उल-फुतुह’ में किया।

जालौर के सोनगरा चौहान

संस्थापक: कीर्तिपाल चौहान (नाडोल शाखा) ने 1181 ई. में जालौर पर अधिकार किया। सुवर्णगिरी दुर्ग का निर्माण। कान्हड़दे चौहान (1296-1311 ई.) प्रतापी शासक। अलाउद्दीन खिलजी ने 1310-11 ई. में जालौर पर आक्रमण किया, कान्हड़दे व पुत्र वीरमदेव वीरगति। पद्मनाभ कृत ‘कान्हड़दे-प्रबन्ध’ प्रमुख स्रोत।

नाडोल के चौहान

संस्थापक: लक्ष्मण देव चौहान। बाद में कीर्तिपाल चौहान ने यहाँ से जालौर शाखा स्थापित की। 1205 ई. के लगभग नाडोल शाखा जालौर में विलीन हो गई।

सिरोही के चौहान (देवड़ा शाखा)

लुम्बा देवड़ा ने 1311 ई. के आसपास आबू-चन्द्रावती पर अधिकार किया। सहसमल ने 1425 ई. में सिरोही नगर बसाया। शिवसिंह ने 1823 ई. में अंग्रेजों से सहायक संधि करने वाले अंतिम शासक थे।

हाड़ौती के चौहान (हाड़ा शाखा)

देवासिंह ने 1241 ई. में बूंदा मीणा को हराकर बूंदी की स्थापना की। जेत्रसिंह ने 1274 ई. में कोटा को राजधानी बनाया। बूंदी के शासक रामसिंह के दरबारी कवि सूर्यमल्ल मिश्रण (रचनाएँ: वंशभास्कर, वीर सतसई) राजस्थान के राज्यकवि कहे जाते हैं। कोटा के मुकुन्दसिंह ने अबलामीणी महल (हाड़ौती का ताजमहल) बनवाया।

चौहान वंश से संबंधित प्रमुख पुस्तकें एवं स्रोत

  • डॉ. दशरथ शर्मा – ‘राजस्थान थ्रू दी एजेज’, ‘अर्ली चौहान डायनेस्टिज’, ‘सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय और उनका युग’।
  • आर. वी. सोमानी – ‘चौहान एण्ड हिज टाइम’।
  • चन्दबरदाई – ‘पृथ्वीराज रासो’ (हिंदी का प्रथम महाकाव्य, 69 समय, 10,000 से अधिक छंद)।
  • जयानक – ‘पृथ्वीराज विजय’।
  • पद्मनाभ – ‘कान्हड़दे-प्रबन्ध’, ‘बीरमदे सोनगरा री बात’।
  • नयनचंद्र सूरी – ‘हम्मीर महाकाव्य’, जोधराज – ‘हम्मीर रासौ’।
  • अमीर खुसरो – ‘खजाइन-उल-फुतुह’, हसन निजामी – ‘ताज-उल-मासिर’, मिनहाज – ‘तबकात-ए-नासिरी’, फरिश्ता – ‘तारीख-ए-फरिश्ता’।

⚡ नोट: यह पोस्ट प्रतियोगी परीक्षाओं (राजस्थान इतिहास) एवं विद्यार्थियों के लिए संपूर्ण चौहान वंश के नोट्स के रूप में तैयार की गई है। इसमें उत्पत्ति के मत, प्रमुख शासक, युद्ध, शाखाओं का विवरण, तराइन के युद्ध, रणथम्भौर एवं जालौर के शाके तथा प्रमुख स्रोतों को सम्मिलित किया गया है।

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